“हिंदी” अपनी मातृभाषा

आज हमारे देश में सभी लोग ज्यादातर विदेशी वस्तुओ का प्रयोग करते है और देशी वस्तुओं का उपयोग करने में हिचकते है। और अब वस्तुओ के साथ-साथ अपनी भाषा का भी अंत कर रहे है।
हिंद देश की भाषा हिंदी है लेकिन फिर भी लोग अंग्रेजी पर जोर दिए हुए है जिसे देखो वो अंग्रेजी में ही बात करने की कोशिश करता है जैसे हिंदी बोलने में शर्म आ रही हो या हिंदी बोलने से उनकी नाक कट जाएगी।

आज लोग इस देश में हिंदी की महत्ता को समझ नहीं रहे है। हिंदी ही हमारे हिंद देश की पहचान है
“हिन्दू है हम वतन है हिंद.. हिन्दुस्ता हमारा…
जब तक है जान हम लगाते रहेंगे ये नारा”

आज भारत देश में लाखो की तादाद में छेत्रीय भाषाए बोली जाती है लेकिन फिर भी हिंदी भाषा सभी भाषाओ की जननी है। हिंदी बोलने वालों की आज संख्या बहुत कम होते जा रही है यह बहुत ही शर्म की बात है, जो हिंद देश में रह कर अपनी भाषा का प्रयोग भी नहीं कर पा रहे है।
यह कहावत आप ने भी सुनी होगी “अंग्रेज चले गए लेकिन अपनी अंग्रेजी छोड़ गए” ये कहावत मुझे अब सच्चा प्रतीत होता दिखाई दे रहा है।

जिस तरीके से भारत के लोग हिंदी में अपनी रुचि कम ले रहे है उस कारण आने वाले दिनों में तो हिंदी का नामो निशान ही खत्म हो जायेगा।हमें इस पर गंभीरता से सोचना होगा और अपने देश की भाषा को बनाये रखने के लिए कुछ कदम उठाने पड़ेंगे। मैं जब लोगों को अंग्रेजी बोलते सुनता हूँ तो यही सोचता हूँ की कम से कम यहाँ के लोग आपस में हिंदी में ही वार्तालाप करें। मैं यह नहीं कहता की आप अंग्रेजी न बोले.. बोले वहाँ जहा इनकी जरूरत समझ में आये।
मुझे लगता है अब आप लोगों को इससे ज्यादा कहने की जरूरत नहीं होगी आप लोग खुद एक समझदार और पढ़े-लिखे व्यक्ति हो और आप मेरी बातों को अच्छी तरह से समझ रहे होंगे।
आज हमारे देश में इंग्लिश स्कूलों में भी ज्यादातर विषय अंग्रेजी में ही पढाये जाते है यह एक अच्छी बात है लेकिन हिंदी को पहले स्थान पर रखना होगा क्योकि हिंदी जानना हमारे लिए बहुत जरूरी है। आज के माता-पिता अपने बच्चो का दाखिला अंग्रेजी स्कूलों में करवा रहे है ताकि उनके बच्चो का भविष्य उज्जवल हो सके लेकिन ऐसे बच्चे अगर हिंदी की जानकारी अपने देश में रह कर ना रखे तो ऐसे ज्ञान का क्या लाभ ??
“अभी कुछ दिनों पहले मैं एक किताब लेने एक किताब की दूकान पर गया था तभी वहां एक लड़का आया जो की इंग्लिश स्कूल में क्लास १० में पढता था। उसने दुकानदार से एक किताब मांगी तो दुकानदार ने उसे वह किताब दिया और लड़के ने किताब का मूल्य पूछा तो दुकानदार ने उस किताब का मूल्य जो की एक सौ पैतालीस (१४५) रुपये था उसने उससे मांगा लड़का समझ नहीं पाया फिर उसने पूछा कितना हुआ?? दुकानदार ने फिर बोला एक सौ पैतालीस (१४५) रुपये। लड़के को फिर नहीं समझ आया तो आखिरकार लड़के ने पूछ ही दिया अंकल १४५ कितना हुआ ??… तो दुकानदार ने कहा वन हंडरेड फोट्टीफाइव (145) फिर लड़के ने रुपये दिया और चला गया। और तब तक मैं सब समझ गया था”

ऐसी घटना आप लोगों ने भी कभी न कभी देंखी ही होगी।
अगर ऐसा ही रहा तो हमारे देश में हिंदी का विनाश हो जायेगा और हमारी आने वाली अगली पीढ़ी हिंदी से वंचित रह जायेगी। इसलिए हमे अपने हिंदी भाषा को बनाये रखने के लिए कुछ न कुछ सभी को मिल कर कदम बढ़ाने होंगे तब जाकर हम अपनी भाषा को सुरक्षित कर सकते है। हम बच्चो के माता-पिता और स्कूलों से यही विनती करते है कि कम से कम बच्चो को अपनी भाषा कि ज्ञान का अनुभव करायें। और हो सके तो बच्चो को घर में उनके माता-पिता उन्हें हिंदी कि बारीकियां बतलाये जिससे जाकर हमारे आगे कि पीढ़ी को हिंदी कि जानकारी मिल सके।

“आप सभी को #हिंदी_दिवस कि हार्दिक शुभकामनाएं”

#जय_हिंद.. #जय_भारत

धन्यवाद् 🙏

© Rahul Seth

फ़ोटो: गूगल

जिंदगी एक सफर

#सफर

जिंदगी
बिल्कुल रेल की
पटरी जैसी है…
कोई छोटी, कोई बड़ी
कोई बहुत दूर तक,
कोई थोड़ी दूर तक…
और हम सब
जिंदगी की
इन पटरियों पर
दौड़ लगाए हुए है
रेल बन कर,
कुछ राजधानी, कुछ शताब्दी
तो कुछ लोकल पैसेंजर बन कर
अपने मंजिल को पाने में,
जिंदगी की इन पटरियों पर
अपनी रेल दौड़ाते हुए
कोई बहुत आगे
निकल जाता है तो,
कोई थोड़ी दूर में ही सिमट जाता हैं।

#राही

© Rahul Seth

बचपन वाली बरसात

कानों में इयरफोन लगाए एक हाथ मे कॉफी मग लिए बालकनी में बैठ आज की बारिश में शहर को भीगते हुए देख रहा था।
शहरों की सड़को पर चकाचौंध करती लाइटे और इन लाइटों में
तेज बारिश को चीरती हुई सरपट दौड़ती गाड़ियों को देख कर भी कही एक सूनापन सा था। और इन्ही सूनेपन में मैं बचपन के ख्यालों में लौट चुका था।
वैसे मैंने गाँव की बारिश का भी बहुत लुत्फ उठाया हुआ है और शहरों में भी।
शायद वो गाँव था या मैं बच्चा??.. जो भी था उन दिनों में बारिश की बात ही अलग थी।
ढ़ेर सारे बच्चों की टोली थी और,
जब बारिश हो जाये वही हमारी होली थी।
हम रोक नही पाते थे खुद को भीगने से,
चाहे मम्मी का डाँट हो या पापा की मार।
बचपन मे सिर्फ बारिश में भिगने को रहते थे हर वक़्त तैयार।

और हाँ अगर आप भी बचपन मे भीगने के शौकीन रहे होंगे तो आपको याद होगा बचपन मे हम सबसे अमीर हुआ करते थे।
“अरे पैसों से नही सिर्फ दिल से क्योंकि हम बच्चे थे।”
अमीर इसलिए क्योंकि उस बारिश में हम सब की अपनी खुद की नाव हुआ करती थी, “अरे भई कागज़ की नाव” ☺

उस बारिश में अपनी कागज़ की नाव को सबसे आगे ले जाने की कोशिशें करते थे। कितना अच्छा था बचपन और बचपन मे वो बारिश।।
शायद कुछ पल के लिए ही मैं आज खो गया था इन बारिशों में,
जी आया फिर से वो बचपन,
कुछ पल के लिए ही सही,
बीन भींगे ही सही।। ❤❤

शहरों में,
रिमझिम करते
पानी की बूँदों में
कुछ खालीपन सा है यहाँ।

गाँव की बारिश में,
पत्तों पर गिरते
पानी के बूँदों की
यहाँ शोर कहाँ?..

गाँव की बारिश में,
खेतों की पगडंडियों पर
भीगते-खेलते यहाँ
बच्चों का झुंड कहाँ?..

बारिश से
खेतों में भरे पानी मे,
यहाँ बेंग (मेढ़क) की वो
टर्र-टर्र की आवाज़ कहाँ?..

बारिश में
गाँव की भींगते
यहाँ सोंधी-सोंधी मिट्टी
की ख़ुशबू कहाँ?..

बारिश
की पानी मे
बचपन वाली हमारी
यहाँ “कागज़ की नाव” कहाँ??..

शहरों मे,
अब ये सब कहाँ??..
रिमझिम करते
पानी की बूँदों में
अब सिर्फ
“खालीपन” सा है यहाँ। 😔

©Rahul Seth

सफर

जैसे ही स्टेशन पर पहुँचा ट्रेन छूटने वाली थी वैसे तो इंडियन रेलवे में पहले से काफी सुधार आया है वरना मजाल हो कोई ट्रेन अपने निर्धारित समय पर निकल जाए। ऊपर से बनारस का अस्त-व्यस्त ट्रैफिक जो आपको कही टाईम से ना पहुचने के लिए पैर पकड़ कर रोकता रहेगा।
वैसे भी ये जाम और सरकारी नियमों के पचड़ों को समझना पत्थर पर खुद का सिर पटकने के बराबर है।

ख़ैर.. मैं इन सब दुविधाओं से निकल कर अपनी सीट पर जा पहुँचा, सीट पर पहुचना भी जैसे कम्प्यूटर डेस्कटॉप पर पड़े किसी फ़ोल्डर के अंदर पड़े 20वें फोल्डर तक पहुचने के बराबर हो।

जब आप बनारस से दिल्ली या दिल्ली से बनारस का सफऱ कर रहे हो तो जैसे उसी ट्रेन में कुछ पल के लिए अपना पूरा शहर बसा होने का एहसास होता है, उसकी सबसे बड़ी वजह अपने बनारस की बोली हैं,
“का भईया कहा जातs हउवा??”,
“अरे गुरु हम त उ फलनवा के जानत हई”,
“अरे चच्चा तई सी हमरो मुबइलिया चारज में लगाये दिहा”
“अऊर बचवा दिल्ली में का कsरेला??” जैसे वाक्यों से वार्तालाप होता सुनाई देता है।
जब आप किसी भी चीज़ को एक लेखक, फिल्मकार या यूँ कह ले एक कैमरे की नजर से देखते है तो आपको हर चीज़ खूबसूरत लगने लगती हैं।

ट्रेन अपनी स्पीड से चल रही थी और लोगो की बातें अपनी स्पीड से।
इसी वार्त्तालाप के बीच में से एक और आवाज़ आरही थी जो मेरा ध्यान अपनी ओर खींचने पर मजबूर कर दी थी।
वो आवाज़ एक माँ और उसके महज तीन साल की बेटी के बीच हो रही बातों की प्यारी सी आवाज़ थी।
वो छोटी लड़की अपनी माँ से तोतले आवाज़ में बड़ी मासूमियत से कह रही थी-

लड़की: मम्मी… अम्म ता जा लहे??
माँ: पापा के पास बेटा।

लड़की: पापा तहा हैं?
माँ: दादी के घर।

लड़की: दादी तहा है?
माँ: पापा के पास।

लड़की: औल दादू?
माँ: दादी के पास।

लड़की: तब आएदा पापा का ग़ल?
माँ: जब ट्रेन पहुँचा देगी मेरी गुड़िया को।

लड़की: अम्म टलेन से जा लहे है?
माँ: हाँ मेरा बच्चा, हम टलेन से जा रहे है।
अच्छा मेरी गुड़िया अब कुछ खा लो। (माँ ने उसकी हाथ मे एक बिस्किट थमाते हुए बोला)।
लेकिन उस छोटी लड़की की उत्सुकता अभी कम नही हुई उसके सवाल जारी है… और माँ भी अपनी मासूम बेटी की मासूमियत भरे हर सवाल का जवाब बहुत मासूमियत से देती जा रही थी।

वैसे एक रूट पर हर बार सफर करना बहुत मुश्किल होता है, जब आप खासकर सफ़र के दौरान इंडियन रेलवे में होते है तो कई बार आपको दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता हैं। और कई बार आपका सफ़र अच्छे लोगो के होने से खूबसूरती के साथ बीत जाता है।

फिलहाल सफर जारी है…

#राही

©Rahul Seth