बचपन वाली बरसात

कानों में इयरफोन लगाए एक हाथ मे कॉफी मग लिए बालकनी में बैठ आज की बारिश में शहर को भीगते हुए देख रहा था।
शहरों की सड़को पर चकाचौंध करती लाइटे और इन लाइटों में
तेज बारिश को चीरती हुई सरपट दौड़ती गाड़ियों को देख कर भी कही एक सूनापन सा था। और इन्ही सूनेपन में मैं बचपन के ख्यालों में लौट चुका था।
वैसे मैंने गाँव की बारिश का भी बहुत लुत्फ उठाया हुआ है और शहरों में भी।
शायद वो गाँव था या मैं बच्चा??.. जो भी था उन दिनों में बारिश की बात ही अलग थी।
ढ़ेर सारे बच्चों की टोली थी और,
जब बारिश हो जाये वही हमारी होली थी।
हम रोक नही पाते थे खुद को भीगने से,
चाहे मम्मी का डाँट हो या पापा की मार।
बचपन मे सिर्फ बारिश में भिगने को रहते थे हर वक़्त तैयार।

और हाँ अगर आप भी बचपन मे भीगने के शौकीन रहे होंगे तो आपको याद होगा बचपन मे हम सबसे अमीर हुआ करते थे।
“अरे पैसों से नही सिर्फ दिल से क्योंकि हम बच्चे थे।”
अमीर इसलिए क्योंकि उस बारिश में हम सब की अपनी खुद की नाव हुआ करती थी, “अरे भई कागज़ की नाव” ☺

उस बारिश में अपनी कागज़ की नाव को सबसे आगे ले जाने की कोशिशें करते थे। कितना अच्छा था बचपन और बचपन मे वो बारिश।।
शायद कुछ पल के लिए ही मैं आज खो गया था इन बारिशों में,
जी आया फिर से वो बचपन,
कुछ पल के लिए ही सही,
बीन भींगे ही सही।। ❤❤

शहरों में,
रिमझिम करते
पानी की बूँदों में
कुछ खालीपन सा है यहाँ।

गाँव की बारिश में,
पत्तों पर गिरते
पानी के बूँदों की
यहाँ शोर कहाँ?..

गाँव की बारिश में,
खेतों की पगडंडियों पर
भीगते-खेलते यहाँ
बच्चों का झुंड कहाँ?..

बारिश से
खेतों में भरे पानी मे,
यहाँ बेंग (मेढ़क) की वो
टर्र-टर्र की आवाज़ कहाँ?..

बारिश में
गाँव की भींगते
यहाँ सोंधी-सोंधी मिट्टी
की ख़ुशबू कहाँ?..

बारिश
की पानी मे
बचपन वाली हमारी
यहाँ “कागज़ की नाव” कहाँ??..

शहरों मे,
अब ये सब कहाँ??..
रिमझिम करते
पानी की बूँदों में
अब सिर्फ
“खालीपन” सा है यहाँ। 😔

©Rahul Seth

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